पाकिस्तान का मुश्किल दौर

पनामागेट में दोषी पाये जाने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. अब अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में शाहिद खाकान अब्बासी ने शपथ ग्रहण की है, जो दस महीने तक प्रधानमंत्री रहेंगे, क्योंकि नवाज का कार्यकाल अभी दस महीने शेष था. अब्बासी भी साफ-शफ्फाफ नहीं है, कुछ आरोप उन पर भी हैं. इसलिए उनके लिए अगले दस महीने मुश्किल भरे हो सकते हैं. दस महीने बाद जब वहां चुनाव होंगे, तब क्या स्थिति बनेगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी.

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) के नेता इमरान खान जिस तरह से एक अरसे से प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर आरोप लगाते आ रहे थे, नवाज के जाने के बाद अब इमरान की कोशिश होगी कि वहां कोई गठबंधन बने, ताकि नवाज की पार्टी को पूरी तरह से तोड़ा जा सके. यह हो भी सकता है कि नवाज की पार्टी टूट भी जाये. हालांकि, यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि इमरान का जनाधार ज्यादातर शहरों में है, लेकिन नवाज का जनाधार शहरों के साथ-साथ सुदूर गांवों तक भी है.

इसलिए स्थिति के स्पष्ट होने के लिए आगामी चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा. वैसे, नवाज की पार्टी के कई बड़े नेता, चाहे उनके घर के सदस्य ही क्यों न हों, किसी न किसी तरह से रिश्वत खाने के आरोपी हैं, और सबके खिलाफ सबूत भी हैं. इसलिए इन सबके जेल जाने में कोई मुश्किल नहीं है. इमरान इस हालात का फायदा उठा तो सकते हैं, लेकिन पूरे पाकिस्तान के लोगों का इमरान को समर्थन नहीं है. यही वजह है कि वहां ऐसे हालात पैदा किये जा रहे हैं, ताकि इमरान के अलावा कोई चेहरा ही न बचे, जिसकी आगामी चुनाव में प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठने की दावेदारी मजबूत हो. इस हालात की तह में जाते हैं, तो यह समझना आसान हो जाता है कि इस बार चुनाव में आइएसआइ और पाक सेना का नियंत्रण रहेगा. ऐसे में बहुत मुमकिन है कि वहां चुनाव में धांधली हो.

अगले दस महीने में पाकिस्तान के हालात और भी खराब होने के आसार हैं, क्योंकि नवाज के हटाये जाने से वहां कट्टरपंथी शक्तियां जोश में आ गयी हैं. नवाज शरीफ के रहते पाकिस्तान में कुछ हद तक लोकतंत्र दिखता था.

भले वह कुछ न कर पा रहे थे, लेकिन उनके बयानों और रवैये में लोकतंत्र की बातें होती थीं और कट्टरपंथ को लेकर सख्ती का संदेश होता था. पाक सेना, जमात-ए-इस्लामी, आतंकी संगठन, इन सब के बीच में आपसी गठजोड़ है, जिसके आड़े आ रहे थे नवाज शरीफ. यहां तक कि पाकिस्तान की न्यायपालिका भी इसी गठजोड़ का हिस्सा नजर आती है, क्योंकि न्यायपालिका में ज्यादातर लोग जमात-ए-इस्लामी के ही लोग हैं. इन सबकी यही कोशिश है कि नवाज शरीफ और उनकी पार्टी को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाये. यही वजह है कि पनामा मामले में आरोप लगते ही ये सारे लोग एकजुट हो गये और उसका नतीजा हमारे सामने है. अब देखना यह है कि आगामी चुनाव में इन्हें कितनी कामयाबी मिलती है.

पाकिस्तान के मौजूदा हालात के मद्देनजर, जहां तक पाकिस्तान के हाथ से लोकतांत्रिक शासन फिसल कर सेना के हाथ में जाने का सवाल है, तो अभी ऐसी स्थिति नहीं दिख रही है.

हां, इतना जरूर है कि पाकिस्तानी सेना हमेशा से यही चाहती है कि वहां की सरकार एक तोता सरकार हो, ताकि सेना को अपनी गतिविधियों को अंजाम देने में कोई अड़चन न आने पाये. एक कमजोर सरकार हो, जो सैन्य हितों को प्रमोट करे. यही वजह है कि लगता है कि वहां सैन्य शासन आ सकता है. अगर ऐसी स्थिति बनती भी है, तो अब अमेरिका उसका समर्थन नहीं करेगा और यह भी उम्मीद है कि वह पाकिस्तान पर कई सारे प्रतिबंध भी लगा दे. क्योंकि इस वक्त चीन को लेकर पाकिस्तान और अमेरिका में काफी दूरियां हो गयी हैं. पाकिस्तान इस वक्त पूरे मध्य एशिया, और दक्षिण एशिया में चीन के हिताें का प्रसार कर रहा है.

पाक सेना प्रमुख बाजवा का यह बयान कि ‘चीन के समर्थन का कर्जदार है पाक’, इस बात की तस्दीक करता है कि पाकिस्तान किस बुरी हालत में है. कुछ साल पहले वहां आर्थिक संकट था और अमेरिका ने मदद देना बंद कर दिया था. उसके बाद जब चीन ने मदद करनी शुरू की, तब वह उठ खड़ा हुआ. दूसरी बात यह है कि पाक सेना की हमेशा से यह काेशिश भी रहती है कि पैसा मिलता रहे, चाहे जहां से भी मिलता रहे.
पहले अमेरिका से आता था, अब अगले दस साल के लिए चीन से आता रहेगा. उसके बाद देखा जायेगा कि मुल्क की क्या स्थिति है, उसी हिसाब से रणनीति बन जायेगी. लेकिन, पाकिस्तान यह समझ नहीं पा रहा है कि चीन से मिली आर्थिक मदद उसके लिए महंगी साबित हो सकती है, क्योंकि चीन कोई अमेरिका नहीं है.

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