संविधान निर्मात्री सभा अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी की स्मृति के साथ हो रही है बेईमानी

अनिल कुमार श्रीवास्तव: जब कोई दल कार्ययोजना को अमलीजामा देता है तो उसे पुनर्निरीक्षण कर अध्यक्ष अपने हस्ताक्षर से स्वीकृत कर लागू करती है और वह कार्ययोजना उसी के नाम पर याद भी की जाती है।विडम्बना यह है कि समानता पर आधारित हमारे संविधान के निर्माण में संविधान निर्मात्री सभा अध्यक्ष बहुमुखी प्रतिभा के धनी भारत के प्रथम राष्ट्रपति परमश्रधेय डॉ राजेन्द्र प्रसाद की स्मृति के साथ कदम कदम पर बेमानी दृष्टिगोचर होती है।धर्मनिरपेक्षता को अपने संस्कारो से दूर होना या धर्मविरोधी होना कतई न मानने वाले भारत रत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद की स्मृतियां खुद जातीयता के मकड़जाल में उलझ कर रह गयी हैं।
सामाजिक संचार माध्यम पर सिर पर उजली व चोनदार टोपी पहने, मुस्कुराते नूरानी चेहरे पर बेमान लगती सफेद मूछों वाला स्वर्णिम आभा सँजोये आकर्षक श्वेत-श्याम चित्र देखकर आज स्वतः सिर श्रद्धा से झुक गया और जेहन में आधुनिक साहित्य, समाजिक गतिविधियों और इतिहास के बीच बरबस द्वंद युद्ध सा छिड़ गया।अहंकार से मुक्त सादगी की प्रतिमूर्ति बेहद सरल और भारतीय वेशभूषा में रहने वाले डॉ राजेन्द्र प्रसाद अपनी खूबियों के बल पर किसी को भी पल भर में प्रभावित कर देते थे।3 दिसम्बर 1884 को कायस्थ कुल में बिहार के जीरादेई में जन्मे विलक्षण प्रतिभा के धनी डॉ राजेन्द्र जी के पिता का नाम महादेव सहाय था।तमाम भाषाओं के जानकार डॉ राजेन्द्र बाबू की शिक्षा की शुरुआत फ़ारसी से हुई।धर्म के नाम पर भेदभाव लुप्त माहौल में शुरुआती दौर से ही इनका रुझान शिक्षा की तरफ था।उस समय समाज मे चल रही बाल विवाह परम्परा का अनुसरण करते हुए महज 12 वर्ष की उम्र में राजवंश देवी के साथ परिणय सूत्र में बंध गए।लेकिन परिवार, स्वास्थ्य जैसी कोई अड़चन इनके शिक्षा लक्ष्य को प्रभावित नही कर सकी।कलकत्ता विवि में प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान हांसिल किया और मासिक छात्रवृति के हकदार हो गए।1915 में कानून के मास्टर की डिग्री पाने में सोने का मेडल मिला।शिक्षा के कदम रुके नही और इन्होंने कानून में डॉक्टरेट की उपाधि हांसिल की।जहाँ एक तरफ वकालत में कलकत्ता में खासा नाम हो गया वही देशभक्ति से प्रेरित डॉ राजेन्द्र प्रसाद देशभक्त गोपाल कृष्णगोखले के सम्पर्क में देशभक्ति को लेकर आये और अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय हो गए।चंपारण आंदोलन के दौरान गांधी जी से भेंट होने के बाद हरिजन, भूकम्प पीड़ितों, हिंदी आदि सामाजिक सेवा के चलते 1911 में बने नवबिहार के गांधी जी बन गए।यूरोप की यात्रा के बाद वो गांधी जी के सबसे प्रिय शिष्यों में सुमार होने लगे और देशभक्ति की मिसालें पेश की।1946 में संविधान बनने की शुरुआत में डॉ राजेन्द्र बाबू संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष चुने गए।2साल 11 माह 18 दिन में सभी सदस्यों द्वारा काफी बौद्धिक मेहनत से तैयार व राजेन्द्र बाबू द्वारा पुनर्निरीक्षण कर हस्ताक्षर कर लागू हुए संविधान में हमारे पहले राष्ट्रपति भी आदरणीय डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी बने।गौर योग्य बात यह है कि 1962 में भारत रत्न का खिताब पाने वाले राजेन्द्र बाबू को देश की जनता इतना दुलार करती थी कि पहले से ही देश रत्न का खिताब दे डाला था।
वैसे तो डॉ राजेन्द्र प्रसाद के विषय पर लिखना सूरज को दिया दिखाना जैसा होगा लेकिन एक सवाल जरूर मुँह बाए खड़ा है कि क्या आजादी के 7 दशक बाद भी इन विभूति की स्मृति के साथ न्याय हुआ है।संविधान में सर्वाधिक योगदान देने के बाद भी जब संविधान दिवस या निर्माण की बात चलती है तो समाज मे इनका नाम बहुत कम ही सुनाई देता है।आजादी में गांधी जी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले इन विभूति की स्मृति बहुत कम करके आंकी जाती है।चाहे वकालत हो या साहित्य हर क्षेत्र में अव्वल रहने वाले सदैव भारतीय वेशभूषा में रहे।आज तक इनकी स्मृति में एक अवकाश नही घोषित किया जा सका है।सिर पर सफेद चोनदार टोपी मुस्कुराते हुए चेहरे पर उजली मूछें, काला कोट श्वेत धोती हांथ में शरीर को सहारा देने वाली पतली छड़ी वाले श्वेत श्याम चित्र के समक्ष श्रद्धा सुमन अर्पित।

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