नुस्खों की आजमाइश से बदतर स्थिति में पहुंच सकते हैं गुर्दा रोगी

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इंडिया मोबी न्यूज़ डेस्क, अनिल कुमार श्रीवास्तव: अधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ में जहाँ एक तरफ तेजी आई है वहीं गुर्दा फेलियर के मामलो में भी बेतहासा वृद्धि हुई है।मेडिकल साइंस में गुर्दा प्रत्यारोपण के अलावा कोई स्थायी इलाज न होने की वजह से भावनाओ से खेलकर पैसा ऐंठने वालो की बाढ़ सी आ गयी है।नीम हकीम, नुस्खों के दावों के मकड़जाल में उलझ कर बीमार बद से बदतर स्थिति में पहुंच जाते हैं।

इधर कुछ दशकों से किंडनी फेलियर के मामले दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं जिसका मुख्य कारण है खान-पान दूषित होना और अंग्रेजी दवाओं का दुष्प्रभाव।मध्यमवर्गीय इंसान नियमित जांच तो करवाने से रहा उसे पता ही तब चलता है जब क्रेटनिन 4 व यूरिया 60 पार कर चुका होता है और गरीब वर्ग तो शायद अंतिम समय मे जान पाता होगा।चिकित्सको के मुताबिक स्वस्थ्य इंसान का क्रेअतिनीन लगभग 1.5 और यूरिया 40 या इससे कम रहना चाहिए तब समझना चाहिए कि गुर्दे पर्याप्त काम कर रहे हैं।तमाम बीमारी भी ऐसी है जो गुर्दो पर बुरा असर डालती हैं जैसे मधुमेह व उच्चरक्तचाप आदि।गुर्दा खराब होने की शुरुआत अनीमिया रक्त की कमी व रक्तचाप के असंतुलन से होती हैं।व्यक्ति को चक्कर आना, सिर दर्द, पैरों पर जोर न होना, जीभ सफेद हो जाना, नाखून में बदलाव, चेहरा पीला पड़ना, भूंख न लगना बार बार उलटी लगना आदि इसके लक्षण होते है।

गुर्दा जब चिकित्सक के पास पहुंचता है तो चिकित्सक उसे सलाह देता है गुर्दा प्रत्यारोपण की। यदि ARF केस होगा तो 2, 3 डायलिसिस के बाद किंडनी पूर्ववत कार्य करने लगती हैं।यदि CRF केस है तो रोगी की किंडनी पूरी तरह से खराब हो चुकी हैं।सबसे पहले फिस्टुला बनवाने की सलाह देता है।क्योंकि एक्सिस पॉइंट चाहिये होता है डायलिसिस के लिए।उसी एक्सिस पॉइंट से तेज फ्लो के सहारे आर्टरी वेन से डायलिसिस के लिए ब्लड लेते हैं जिसे मशीन द्वारा डायलेज़र से रक्त की असुद्धियाँ व फ्ल्यूड रिमूव करते हैं।इस दौरान ब्लड बढ़ाने वाले इंजेक्शनों को भी लगाना पड़ता है।इस डायलिसिस प्रक्रिया के दौरान बीपी, फीवर, सुगर, अन्य आवश्यक जांचों की मेजरिंग करनी पड़ती है तकनीकी स्टाफ को।उधर जब बीमार व तीमारदार इस गम्भीर बीमारी से जूझ रहा होता है तब विभिन्न माध्यमो से प्रचार कर रहे झोलाछाप नीमहकीमों के मकड़जाल में फंस कर अपनी बीमारी को और बढ़ा लेते हैं।शर्तिया इलाज का दावा देकर ये कथित चिकित्सक रोगी व उसके चाहने वालो की भावनाओं से खूब खेलते हैं।पुड़िया, शीशी व देशी नुस्खे को बेहतरीन प्रवचनों के साथ ऐसा बांधते हैं कि इनका उलटा असर ऐसा होता है कि गुर्दा रोग विशेषज्ञ के भी हांथ पांव फूल जाएं और मरीज को सामान्य करने की जद्दोजहद उठानी पड़े।कभी कभी तो मरीज इंसेंटिव केयर यूनिट में दिखाई देता है।हालांकि साथ ही जो परहेज कराते हैं उसकी वजह से शुरुआत में तो असर दिखाई देता है लेकिन इन नुस्खों से गुर्दे की कार्यक्षमता और कम हो जाती है।

तमाम आडम्बरो से भरे ये कथित चिकित्सक इलाज का नाम आयुर्वेद, होम्योपैथ, यूनानी आदि नाम देते हैं साथ ही पीर, फकीर, भभूत आदि को भी कारगर बताते हैं।मौजूदा समय मे बढ़ती गुर्दा रोग समस्या को देखते हुए आम जनमानस को समय समय पर किंडनी फंक्शन टेस्ट करवाना अनिवार्य हो चला है।गुर्दा शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है जो छन्ने का काम करता है।रक्त को स्वच्छ करने के साथ साथ असुद्धियाँ मूत्र के मार्ग से बाहर करता है और हमारे ह्रदय को शुद्ध रक्त देता है।इसलिए हमें इस आंतरिक अंग के लिए कतई असावधानी नही बरतनी चाहिए।इसके अलावा यदि गुर्दा फेल हो गए हैं तो भी डायलीसिस के सपोर्ट से जीवन जिया जा सकता है।सबसे पहले डायलिसिस रोगी को गुर्दा रोग विशेषज्ञ पर विश्वास करना होगा।और नीम हकीम के चक्कर मे नही पड़ना होगा।खान पान का यथा सम्भव परहेज, नियमित डायलिसिस, चिकित्सक द्वारा सुझाई गयी दवाई डायलिसिस रोगी को स्थिर बनाये रख सकती हैं हा प्राइमरी मॉनिटरिंग स्वयं करनी होगी जैसे रक्तचाप, सुगर, ज्वर आदि।तबियत ज्यादा न बिगड़े इसके लिए बिना गुर्दा रोग विशेषज्ञ की सलाह के किसी नुस्खे की आजमाइश घातक हो सकती है।

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